ज़ियारत-ए-नाहिया (अरबी: زیارة الناحية) एक प्रसिद्ध ज़ियारत (सलाम) है जो हमारे 12वें इमाम, हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और करबला के शहीदों को संबोधित करते हुए पढ़ी थी। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) की मसीबतों का बयान इतना मार्मिक है कि इसे पढ़ते हुए हर मोमिन की आंखें भर आती हैं।
इस ज़ियारत में इमाम सज्जाद (अ.स.) फरमाते हैं: ziyarat e nahiya in hindi
इसकी शुरुआत आदम (अ.स.) से लेकर पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.व.) तक विभिन्न नबियों पर सलाम भेजने से होती है। the falling from the horse
It describes the scene of the battlefield—the thirst, the falling from the horse, and the sorrow of the household (Ahlul Bayt). ziyarat e nahiya in hindi
इमाम बयान करते हैं कि जब ज़ालिमों ने इमाम हुसैन (अ.स.) को चारों तरफ़ से घेर लिया था, जब उनके जिस्म पर तीरों की बारिश हो रही थी और वह घोड़े की जीन से ज़मीन पर आ रहे थे, तो उस वक़्त का मंज़र कितना भयानक था! इमाम महदी (अ.स.) कहते हैं कि हुसैन (अ.स.) के जिस्म को घोड़ों की टापों से रौंदा गया।"
ज़ियारत-ए-नाहिया कोई साधारण दुआ नहीं है, बल्कि यह वह दर्दनाक ज़ियारत है जो बारहवें इमाम, इमाम महदी (अ.स.) से हम तक पहुँची है। इसमें उन्होंने कर्बला के मैदान में अपने पूर्वज इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफादार साथियों की शहादत का ऐसा आंखों देखा और रोंगटे खड़े कर देने वाला मंज़र बयान किया है, जो किसी भी इंसान की आँखों में आँसू ला दे।
ज़ियारत-ए-नाहिया (अरबी: زیارة الناحية) एक प्रसिद्ध ज़ियारत (सलाम) है जो हमारे 12वें इमाम, हज़रत इमाम मेहदी (अ.स.) ने हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) और करबला के शहीदों को संबोधित करते हुए पढ़ी थी। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) की मसीबतों का बयान इतना मार्मिक है कि इसे पढ़ते हुए हर मोमिन की आंखें भर आती हैं।
इस ज़ियारत में इमाम सज्जाद (अ.स.) फरमाते हैं:
इसकी शुरुआत आदम (अ.स.) से लेकर पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.व.) तक विभिन्न नबियों पर सलाम भेजने से होती है।
It describes the scene of the battlefield—the thirst, the falling from the horse, and the sorrow of the household (Ahlul Bayt).
इमाम बयान करते हैं कि जब ज़ालिमों ने इमाम हुसैन (अ.स.) को चारों तरफ़ से घेर लिया था, जब उनके जिस्म पर तीरों की बारिश हो रही थी और वह घोड़े की जीन से ज़मीन पर आ रहे थे, तो उस वक़्त का मंज़र कितना भयानक था! इमाम महदी (अ.स.) कहते हैं कि हुसैन (अ.स.) के जिस्म को घोड़ों की टापों से रौंदा गया।"
ज़ियारत-ए-नाहिया कोई साधारण दुआ नहीं है, बल्कि यह वह दर्दनाक ज़ियारत है जो बारहवें इमाम, इमाम महदी (अ.स.) से हम तक पहुँची है। इसमें उन्होंने कर्बला के मैदान में अपने पूर्वज इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफादार साथियों की शहादत का ऐसा आंखों देखा और रोंगटे खड़े कर देने वाला मंज़र बयान किया है, जो किसी भी इंसान की आँखों में आँसू ला दे।